ग़ज़ल : 288 - गाली



चाहता हूँ कि बकूँ उसको गाली पे गाली ।।
लफ़्ज़ बस मुँह से निकलते हैं दो ही हट , साली ।।1।।
हुस्न से लगती है मंदिर की सीता-राधा वो ,
है तवाइफ़ के भी क़िरदार से बड़ी वाली ।।2।।
शाहख़र्च इतनी है इतनी कि हो यक़ीं कैसे ,
वो किया करती है दिन-रात सिर्फ़ हम्माली ।।3।।
अपनी बोली से तो कोयल का चूज़ा लगती है ,
है इरादों से मगर ख़ौफ़नाक और काली ।।4।।
जब जला लेती है होली दिलों की रूई सी ,
तब मनाती है शबोरोज़ ईद-दीवाली ।।5।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Rohitas ghorela said…
भावना रहित।
जिसे गजल का नाम देना भी गुनहा।
धन्यवाद । Rohitas ghorela जी ।

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