ग़ज़ल : 287 - भारी-भरकम



बाहर रेल की पटरी से भारी-भरकम ।।
अंदर बाँस से भी कुछ हल्के-फुल्के हम ।।1।।
थककर चूर हैं लेकिन ख़ुद को जाने क्यों ?
दिखलाते हैं हमेशा इकदम ताज़ादम ।।2।।
चेहरे से यूँ नदारद रखते हर पीड़ा ,
बस सब लोग समझ जाते हम हैं बेग़म ।।3।।
मैक़श से न कभी कहना मै को गंदी ,
उसका मक्का है मैख़ाना , दारू ज़मज़म ।।4।।
भागमभाग किया करते , सब है फिर भी ,
क्यों जीने की ही ख़ातिर होते हैं बेदम ।।5।।
कुछ ही अंधे करें मिल बातें चश्मों की ,
लँगड़े ख़्वाब में सब नाचें ना छम-छम-छम ।।6।।
पैसा बंद हुआ रुपया भी कमक़ीमत ,
महँगे सब तो हुए डॉलर , दीनारोदिरम ।।7।।
हैराँ हूँ हैं जनाज़े में शामिल लाखों ,
लेकिन दिखती नहीं इक की भी आँखें नम ।।8।।
माना पास नहीं अपने लेकिन ख़ुश हैं ,
जाएदाद , ज़मीं , सोना-चाँदी सी रक़म ।।9।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Rohitas ghorela said…
वाह
बहुत सुंदर गजल.
परेशानी छुपाये आज कल फिरता है हर कोई.

आइयेगा- प्रार्थना
Anita saini said…
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(१६ -0२-२०२०) को 'तुम्हारे मेंहदी रचे हाथों में '(चर्चा अंक-१३३६) पर भी होगी
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
**
अनीता सैनी
धन्यवाद । रोहितास जी ।
धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।
Nitish Tiwary said…
बहुत सुंदर ग़ज़ल।
धन्यवाद । नितीश तिवारी जी ।
Onkar said…
बहुत सुन्दर
धन्यवाद । ओंकार जी ।
Jyoti khare said…
वाह
बहुत सुंदर
धन्यवाद । ज्योति खरे जी ।

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