मुक्तक : 947 - फ़र्ज़


अपने चुन-चुन दर्दो-ग़म दिल में दबाकर रख रहा ।।
हँसते-हँसते वह , न बिलकुल मुँह बनाकर रख रहा ।।
फ़र्ज़ , ज़िम्मेदारियों का वज़्न पर्वत से न कम ;
अपने पूरे घर की , फूलों सा उठाकर रख रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (14-01-2020) को   "सरसेंगे फिर खेत"   (चर्चा अंक - 3580)   पर भी होगी। 
-- 
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
-- 
लोहिड़ी तथा उत्तरायणी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्तक : 946 - फूल