Monday, January 6, 2020

दीर्घ मुक्तक - 945 - माज़ी ( अतीत )


कौन सा ज़ह्र खा हमने जाँ छोड़ दी , 
बिन तुम्हारे भी जीने को जीते रहे ।।
ये अलग बात है साथ तुम थे तो सच , 
मुश्क़िलों से ज़ियादा सुभीते रहे ।।
गर्मियों की चिलकती हुई धूप में , 
हम दरख़्तों के साए में जा बैठकर ; 
प्यास अपनी बुझाने को माज़ी में जा , 
तेरी यादों के शर्बत को पीते रहे ।। 
-डॉ हीरालाल प्रजापति

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...