दीर्घ मुक्तक : 944 - दीदार


बाद जाने के तेरे तुझको पता क्या फिर से तेरे ,
लौटकर आने का रस्ता रात-दिन तकते रहेंगे ।।
और कुछ हरगिज़ न बोलेंगे कभी अपनी जुबाँ से ,
सिर्फ़ तेरा नाम ही ईमान से रटते रहेंगे ।।
सख़्त तनहाई हो या महफ़िल हो इससे बेअसर रह ,
हम तेरे दीदार के प्यासे किसी मानिंदे बुत ही ,
इक दफ़ा भी इक पलक झपके बिना तेरी क़सम रे ,
सिर झुका कर बस तेरी तस्वीर ही लखते रहेंगे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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