ग़ज़ल : 286 - मानते हैं


इक उनका बुत बनाने मिट्टी को छानते हैं ।।
अपना लहू मिलाकर फिर उसको सानते हैं ।।
हैराँ न वो हमारे , रोने पे हो रहे हैं ,
हों मस्ख़रों को भी ग़म , शायद वो जानते हैं ।।
मैं उनको जाँ भी दे दूँ , वो ख़ुश ज़रा न होंगे ,
जाँ मुफ़्त की है मेरी ऐसा जो मानते हैं ।।
जिनको भुलाना शायद , मुमकिन न हो सकेगा ,
उनको ही भूल जाने , की रोज़ ठानते हैं ।।
कहते हैं " हम नशे का मतलब नहीं समझते " ,
वो रोज़-रोज़ ख़ुद ही , जो भंग छानते हैं ।।
छोटी से छोटी बातों पर लोग-बाग अब तो ,
फटकार-डाँट की जा , बंदूक तानते हैं ।।
अब सब्रो-ज़ब्त किसमें बाक़ी ज़रा-ज़रा में ,
बूढ़े भी नौजवानों सा ख़ूँ उफानते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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