ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो


चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।।
आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।।
ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दोस्तों ,
गर जहाँ में एक भी , जिसका हबीब हरगिज़ न हो ।।
हक़ नहीं बीमार होने , का उसे जिसकी न याँ -
हो सके तीमारदारी , औ' तबीब हरगिज़ न हो ।।
हमको कब लाज़िम फ़रिश्ता , और कब शैतान ही ,
चाहिए इक आम इंसाँ , जो अजीब हरगिज़ न हो ।।
कोह पर चढ़ते हुए हो , सर पहाड़ी बोझ क्या ,
पीठ पर लेकिन किसी के , भी सलीब हरगिज न हो ।।
इक क़लमकार , उम्दा शायर , होके तू भूखा मरे ,
उससे बेहतर मस्ख़रा बन , जा अदीब हरगिज़ न हो ।।
( तबीब = चिकित्सक , कोह = पहाड़ )
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anita saini said…
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२० -०१-२०२० ) को "बेनाम रिश्ते "(चर्चा अंक -३५८६) पर भी होगी
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्तक : 946 - फूल