ग़ज़ल : 284 - पटक बैठीं


वे ग़फ़्लत में मेरे आगे ज़रा सा क्या मटक बैठीं ;
मेरी तो बस के आँखों में , चुरा दिल , ले सटक बैठीं ।। 
मैं बारिश की तमन्ना में पड़ा था अब्र को तकते ,
खुली ज़ुल्फें वे कर गीली , मेरे ऊपर झटक बैेठीं ।।
नहीं हँसते हैं वे लेकिन , जब हँसते हैं तो लगता है ,
किसी उजड़े चमन में हर तरफ कलियाँ चटक बैठीं ।।
बहुत चाहा मगर उनसे बिछड़ मैं भी न मर पाया ,
न वे मुझसे जुदा होते ही , फाँसी पर लटक बैठीं ।।
सुराखों से निकल आए , पहाड़ों से मेरे हाथी ,
न मानोगे सभी की साँप सी पूँछें अटक बैठीं ।। 
अदावत कब मुझे मुझको तो , मेरी यारियाँ यारों ,
उठाकर आस्मानों से , ज़मीनों पर पटक बैठीं ।।
यक़ीनन हर अदा उनकी , फटाफट जानलेवा थी ,
मगर कुछ अटपटी बातें , मेरे दिल को खटक बैठीं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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