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ग़ज़ल : 287 - भारी-भरकम

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बाहर रेल की पटरी से भारी-भरकम ।।
अंदर बाँस से भी कुछ हल्के-फुल्के हम ।।1।।
थककर चूर हैं लेकिन ख़ुद को जाने क्यों ?
दिखलाते हैं हमेशा इकदम ताज़ादम ।।2।।
चेहरे से यूँ नदारद रखते हर पीड़ा ,
बस सब लोग समझ जाते हम हैं बेग़म ।।3।।
मैक़श से न कभी कहना मै को गंदी ,
उसका मक्का है मैख़ाना , दारू ज़मज़म ।।4।।
भागमभाग किया करते , सब है फिर भी ,
क्यों जीने की ही ख़ातिर होते हैं बेदम ।।5।।
कुछ ही अंधे करें मिल बातें चश्मों की ,
लँगड़े ख़्वाब में सब नाचें ना छम-छम-छम ।।6।।
पैसा बंद हुआ रुपया भी कमक़ीमत ,
महँगे सब तो हुए डॉलर , दीनारोदिरम ।।7।।
हैराँ हूँ हैं जनाज़े में शामिल लाखों ,
लेकिन दिखती नहीं इक की भी आँखें नम ।।8।।
माना पास नहीं अपने लेकिन ख़ुश हैं ,
जाएदाद , ज़मीं , सोना-चाँदी सी रक़म ।।9।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 286 - मानते हैं

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इक उनका बुत बनाने मिट्टी को छानते हैं ।। अपना लहू मिलाकर फिर उसको सानते हैं ।। हैराँ न वो हमारे , रोने पे हो रहे हैं , हों मस्ख़रों को भी ग़म , शायद वो जानते हैं ।। मैं उनको जाँ भी दे दूँ , वो ख़ुश ज़रा न होंगे , जाँ मुफ़्त की है मेरी ऐसा जो मानते हैं ।। जिनको भुलाना शायद , मुमकिन न हो सकेगा , उनको ही भूल जाने , की रोज़ ठानते हैं ।। कहते हैं " हम नशे का मतलब नहीं समझते " , वो रोज़-रोज़ ख़ुद ही , जो भंग छानते हैं ।। छोटी से छोटी बातों पर लोग-बाग अब तो , फटकार-डाँट की जा , बंदूक तानते हैं ।। अब सब्रो-ज़ब्त किसमें बाक़ी ज़रा-ज़रा में , बूढ़े भी नौजवानों सा ख़ूँ उफानते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 949 - तक़दीर

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पार जो करता हमें ख़ुद डूब वो बजरा गया रे ;
अब अगर होगा लिखा तक़दीर में लगना कनारे -
तो यक़ीनन ग़र्क़े दरिया हों कि उससे पहले आकर ,
देखना तिनके बचा लेंगे हमें देकर सहारे ।।
( बजरा = बड़ी नाव , कनार = तट , ग़र्क़े दरिया = नदी में डूबना )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

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चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।।
आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।।
ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दोस्तों ,
गर जहाँ में एक भी , जिसका हबीब हरगिज़ न हो ।।
हक़ नहीं बीमार होने , का उसे जिसकी न याँ -
हो सके तीमारदारी , औ' तबीब हरगिज़ न हो ।।
हमको कब लाज़िम फ़रिश्ता , और कब शैतान ही ,
चाहिए इक आम इंसाँ , जो अजीब हरगिज़ न हो ।।
कोह पर चढ़ते हुए हो , सर पहाड़ी बोझ क्या ,
पीठ पर लेकिन किसी के , भी सलीब हरगिज न हो ।।
इक क़लमकार , उम्दा शायर , होके तू भूखा मरे ,
उससे बेहतर मस्ख़रा बन , जा अदीब हरगिज़ न हो ।।
( तबीब = चिकित्सक , कोह = पहाड़ )
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 284 - पटक बैठीं

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वे ग़फ़्लत में मेरे आगे ज़रा सा क्या मटक बैठीं ; मेरी तो बस के आँखों में , चुरा दिल , ले सटक बैठीं ।।  मैं बारिश की तमन्ना में पड़ा था अब्र को तकते , खुली ज़ुल्फें वे कर गीली , मेरे ऊपर झटक बैेठीं ।। नहीं हँसते हैं वे लेकिन , जब हँसते हैं तो लगता है , किसी उजड़े चमन में हर तरफ कलियाँ चटक बैठीं ।। बहुत चाहा मगर उनसे बिछड़ मैं भी न मर पाया , न वे मुझसे जुदा होते ही , फाँसी पर लटक बैठीं ।। सुराखों से निकल आए , पहाड़ों से मेरे हाथी , न मानोगे सभी की साँप सी पूँछें अटक बैठीं ।।  अदावत कब मुझे मुझको तो , मेरी यारियाँ यारों , उठाकर आस्मानों से , ज़मीनों पर पटक बैठीं ।। यक़ीनन हर अदा उनकी , फटाफट जानलेवा थी , मगर कुछ अटपटी बातें , मेरे दिल को खटक बैठीं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : शिकस्ता दिल

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यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ।।
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।1।।
ख़ुुदा ने जब तुम्हें बख़्शी है सूरत चाँद से प्यारी ;
तुम्हारा जिस्म जैसे राजधानी की है फुलवारी ;
तुम्हें सिंगार से ज्यादा है फबती सादगी फिर क्या -
मुनासिब है यूँ ही सजने में ज़ाया वक़्त को करना ?2?
यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।
अगर तेरा मोहब्बत में जो पड़ने का इरादा है ;
तो सुन ले सब शराबों से कहीं इसमें ज़ियादा है ;
अगर चढ़ जाए तो फिर ये किसी सूरत नहीं उतरे ,
वो कहता है नशा-ए-इश्क़ बिलकुल भी नहीं चखना ।।3।।
यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।
मोहब्बत लाज़िमी इस उम्र में सबको कहानी में ;
लगे है इश्क़ ही जैसे हो सब कुछ नौजवानी में ;
मगर कहता है जो तो क्या ग़लत कहता है वो बोलो ?
"कभी मत कमसिनी में आशिक़ी के फेर में पड़ना ।।"4।।
यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

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मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।।
हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।।
उनसे वादा था हमारा साथ मरने का ,
कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 947 - फ़र्ज़

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अपने चुन-चुन दर्दो-ग़म दिल में दबाकर रख रहा ।।
हँसते-हँसते वह , न बिलकुल मुँह बनाकर रख रहा ।।
फ़र्ज़ , ज़िम्मेदारियों का वज़्न पर्वत से न कम ;
अपने पूरे घर की , फूलों सा उठाकर रख रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 946 - फूल

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जो रखते हैं यहाँ पे चंद उसूल मुझ जैसे ;
नहीं सभी को होते हैं क़बूल मुझ जैसे ।।
गुलाब , मोगरे , कँवल की दुनिया दीवानी ;
करे है सख़्त नापसंद फूल मुझ जैसे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

दीर्घ मुक्तक - 945 - माज़ी ( अतीत )

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कौन सा ज़ह्र खा हमने जाँ छोड़ दी , 
बिन तुम्हारे भी जीने को जीते रहे ।।
ये अलग बात है साथ तुम थे तो सच , 
मुश्क़िलों से ज़ियादा सुभीते रहे ।।
गर्मियों की चिलकती हुई धूप में , 
हम दरख़्तों के साए में जा बैठकर ; 
प्यास अपनी बुझाने को माज़ी में जा , 
तेरी यादों के शर्बत को पीते रहे ।। 
-डॉ हीरालाल प्रजापति

दीर्घ मुक्तक : 944 - दीदार

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बाद जाने के तेरे तुझको पता क्या फिर से तेरे ,
लौटकर आने का रस्ता रात-दिन तकते रहेंगे ।।
और कुछ हरगिज़ न बोलेंगे कभी अपनी जुबाँ से ,
सिर्फ़ तेरा नाम ही ईमान से रटते रहेंगे ।।
सख़्त तनहाई हो या महफ़िल हो इससे बेअसर रह ,
हम तेरे दीदार के प्यासे किसी मानिंदे बुत ही ,
इक दफ़ा भी इक पलक झपके बिना तेरी क़सम रे ,
सिर झुका कर बस तेरी तस्वीर ही लखते रहेंगे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : साल नया सबको मुबारक़

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हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !! इस बार में नववर्ष का स्वागत न करूँगा ।। रंजीदा हूँ , ग़मगीन हूँ , मातम से भरा हूँ , बाहर से लगूँ ज़िंदा पर अंदर से मरा हूँ , महफ़िल को लगाने दो ठहाकों पे ठहाके , मैं तो मज़ाक़ो-मस्ख़री पे भी न हँसूँगा ।। हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !! इस सन में यूँ तक़्लीफ़ उठाई है सुनो तो , बारिश में पतँग जैसे उड़ाई है सुनो तो , उम्मीद की अब भी न किरन सामने मेरे , बेरहम मुश्क़िलों से मैं कब तक के लडूँगा ।। हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !! सूरत में किसी भी वो किसी हाल में तय थी , जिस ख़्वाब की ताबीर इसी साल में तय थी , ख़त्म उसकी मियाद हो गई जब कुछ न बचा रे , अरमाँ मैं भला क्या कोई अब पाल सकूँगा ? हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !! इस बार में नववर्ष का स्वागत न करूँगा ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति