गीत : नववर्ष


किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।।
जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।।
व्यसनी तो करते सेवन ; हो ना हो कोई अवसर ,
कुछ लोग पान करते ; मदिरा का हर्ष में भर ,
कतिपय हों किंतु ऐसे ,भी लोग सब सर्वथा जो ;
पीते असह्य दुख में , आकण्ठ डूब आसव ।।
किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।।
जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।।
जीवन में जिसके संशय ; धूनी रमा के बैठा ,
दुर्भाग्य घर में घुसकर ; डेरा जमा के बैठा ,
जिस मन में व्याप्त कोलाहल-चीत्कार-क्रंदन ,
इक रंच मात्र भी ना पंचम स्वरीय कलरव ।।
किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।।
जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (01-01-2020) को   "नववर्ष 2020  की हार्दिक शुभकामनाएँ"    (चर्चा अंक-3567)    पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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नव वर्ष 2020 की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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