मुक्तक : 943 - मिर्ची


 मिर्ची ही गुड़ समझकर हँस-हँस चबा रहे हैं ।।
तीखी है पर न आँखें टुक डबडबा रहे हैं ।।
कुछ हो गया कि चाकू से काटते हैं पत्थर ,
पानी को मुट्ठियों में कस-कस दबा रहे हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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