Wednesday, December 25, 2019

मुक्तक : 942 - बादशाह


पागल नहीं तो क्या हैं अपने दुश्मनों को भी ,
जो मानते हैं तह-ए-दिल से ख़ैरख़्वाह हम ?
करते हैं अपने बेवफ़ाओं को भी रात-दिन ,
सच्ची मोहब्बतें औ' वह भी बेपनाह हम ।।
किस डर से हम न जानें ये अमीर लोग-बाग ,
कहते हैं अपने आपको फ़क़ीर दोस्तों ;
बेदख़्ल होके भी ज़मीन-जाएदाद से ,
क्यों अब भी ख़ुद को मानते हैं बादशाह हम ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

2 comments:

Anita Laguri "Anu" said...

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (27-12-2019) को "शब्दों का मोल" (चर्चा अंक-3562)  पर भी होगी।

चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

आप भी सादर आमंत्रित है 
….
-अनीता लागुरी 'अनु '

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! अनिता जी ।

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

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