मुक्तक : 941 - बेवड़ा


लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे , 
कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।।
बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह , 
जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।।
सोचता हूँ कि कितने मेरे सामने , 
नाम तक भी न दारू का जिनने लिया ;
इक के बाद इक गुजरते गए दिन-ब-दिन , 
ज़िंदा मुझ जैसा क्यों बेवड़ा रह गया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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