मुक्तक : 940 - भूख


हाँ कई दिन से न था खाने को मेरे पास कुछ ।।
आगे भी रोटी के मिलने की नहीं थी आस कुछ ।।
भूख में इंसाँ को अपने मार मैं पशु बन गया ,
जाँ बचाने को चबाने लग गया मैं घास कुछ ।।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anita saini said…
बहुत ही उम्दा
सादर
शुक्रिया । अनिता सैनी जी ।

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