Monday, December 23, 2019

मुक्तक : 940 - भूख


हाँ कई दिन से न था खाने को मेरे पास कुछ ।।
आगे भी रोटी के मिलने की नहीं थी आस कुछ ।।
भूख में इंसाँ को अपने मार मैं पशु बन गया ,
जाँ बचाने को चबाने लग गया मैं घास कुछ ।।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

2 comments:

Anita saini said...

बहुत ही उम्दा
सादर

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

शुक्रिया । अनिता सैनी जी ।

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