दीर्घ मुक्तक : 938 - सर को पटक


ज़ुल्फ़ों में तेरी टाँकने काँंटों में खिले गुल ,
हाथों को किया ज़ख़्मी मगर तोड़ के लाया ।।
अखरोट जो पत्थर से भी हैं फूटें बमुश्किल ,
ख़्वाहिश पे तेरी सर को पटक तोड़ के लाया ।।
आया है किसी सख़्त से भी सख़्त ये कैसा ?
आया हूँ तो जाने का तेरे वक़्त ये कैसा ?
जाता था कहीं और मगर हाय रे ! ख़ुद को ,
तेरी ही सदा पर तो यहाँ मोड़ के लाया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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