ग़ज़ल : 283 - आशिक़ी


मुझको लगता है ये ज़ह्र खा , ख़ुदकुशी कर ना जाऊँ कहीं ? 
अगले दिन की करूँ बात क्या , आज ही कर ना जाऊँ कहीं ? 
है तो दुश्मन मेरा वो मगर , ख़ूबसूरत हसीं इस क़दर ;
देखकर मुझको होता है डर , आशिक़ी कर ना जाऊँ कहीं ? 
एक वाइज हूँ मैं पर मेरी , इक शराबी से है दोस्ती ;
मुझ को शक़ हो मैं भूले कभी , मैक़शी कर ना जाऊँ कहीं ? 
मस्ख़री की लतीफ़ेे कहे , देख सुन भी वो चुप ही रहे ;
देखने उसका हँसना उसे , गुदगुदी कर ना जाऊँ कहीं ?
आज हालात हैं पेश वो , उम्र भर हाय जिस काम को ;
सख़्त करने से बचता रहा , मैं वही कर ना जाऊँ कहीं ? 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (30-12-2019) को 'ढीठ बन नागफनी जी उठी!' चर्चा अंक 3565 पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं…
*****
रवीन्द्र सिंह यादव
धन्यवाद । Ravindra Singh Yadav जी ।
बहुत उम्दा।
धन्यवाद । मन की वीणा जी ।
Jyoti khare said…
वाह
बहुत सुंदर
सादर
धन्यवाद । ज्योति खरे जी ।

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