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Showing posts from December, 2019

गीत : नववर्ष

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किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।। जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।। व्यसनी तो करते सेवन ; हो ना हो कोई अवसर , कुछ लोग पान करते ; मदिरा का हर्ष में भर , कतिपय हों किंतु ऐसे ,भी लोग सब सर्वथा जो ; पीते असह्य दुख में , आकण्ठ डूब आसव ।। किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।। जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।। जीवन में जिसके संशय ; धूनी रमा के बैठा , दुर्भाग्य घर में घुसकर ; डेरा जमा के बैठा , जिस मन में व्याप्त कोलाहल-चीत्कार-क्रंदन , इक रंच मात्र भी ना पंचम स्वरीय कलरव ।। किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।। जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 283 - आशिक़ी

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मुझको लगता है ये ज़ह्र खा , ख़ुदकुशी कर ना जाऊँ कहीं ?  अगले दिन की करूँ बात क्या , आज ही कर ना जाऊँ कहीं ?  है तो दुश्मन मेरा वो मगर , ख़ूबसूरत हसीं इस क़दर ; देखकर मुझको होता है डर , आशिक़ी कर ना जाऊँ कहीं ?  एक वाइज हूँ मैं पर मेरी , इक शराबी से है दोस्ती ; मुझ को शक़ हो मैं भूले कभी , मैक़शी कर ना जाऊँ कहीं ?  मस्ख़री की लतीफ़ेे कहे , देख सुन भी वो चुप ही रहे ; देखने उसका हँसना उसे , गुदगुदी कर ना जाऊँ कहीं ? आज हालात हैं पेश वो , उम्र भर हाय जिस काम को ; सख़्त करने से बचता रहा , मैं वही कर ना जाऊँ कहीं ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 943 - मिर्ची

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मिर्ची ही गुड़ समझकर हँस-हँस चबा रहे हैं ।। तीखी है पर न आँखें टुक डबडबा रहे हैं ।। कुछ हो गया कि चाकू से काटते हैं पत्थर , पानी को मुट्ठियों में कस-कस दबा रहे हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 942 - बादशाह

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पागल नहीं तो क्या हैं अपने दुश्मनों को भी , जो मानते हैं तह-ए-दिल से ख़ैरख़्वाह हम ? करते हैं अपने बेवफ़ाओं को भी रात-दिन , सच्ची मोहब्बतें औ' वह भी बेपनाह हम ।। किस डर से हम न जानें ये अमीर लोग-बाग , कहते हैं अपने आपको फ़क़ीर दोस्तों ; बेदख़्ल होके भी ज़मीन-जाएदाद से , क्यों अब भी ख़ुद को मानते हैं बादशाह हम ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

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लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।। सोचता हूँ कि कितने मेरे सामने ,  नाम तक भी न दारू का जिनने लिया ; इक के बाद इक गुजरते गए दिन-ब-दिन ,  ज़िंदा मुझ जैसा क्यों बेवड़ा रह गया ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 940 - भूख

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हाँ कई दिन से न था खाने को मेरे पास कुछ ।। आगे भी रोटी के मिलने की नहीं थी आस कुछ ।। भूख में इंसाँ को अपने मार मैं पशु बन गया , जाँ बचाने को चबाने लग गया मैं घास कुछ ।। - डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 939 - ख़ैरात में

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चमचमाते दिन में ना  भूले भी काली रात में ।। क़र्ज़ में हरगिज़ नहीं ,  बिलकुल नहीं सौग़ात में ।। मुझपे गर दिल आये तो ही  मुझसे करना प्यार तू ,  लूटना है दिल तेरा ,  पाना नहीं ख़ैरात में ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

दीर्घ मुक्तक : 938 - सर को पटक

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ज़ुल्फ़ों में तेरी टाँकने काँंटों में खिले गुल ,
हाथों को किया ज़ख़्मी मगर तोड़ के लाया ।।
अखरोट जो पत्थर से भी हैं फूटें बमुश्किल ,
ख़्वाहिश पे तेरी सर को पटक तोड़ के लाया ।।
आया है किसी सख़्त से भी सख़्त ये कैसा ?
आया हूँ तो जाने का तेरे वक़्त ये कैसा ?
जाता था कहीं और मगर हाय रे ! ख़ुद को ,
तेरी ही सदा पर तो यहाँ मोड़ के लाया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति