दीर्घ मुक्तक : 936 - हाय


बस उसको देखते ही सच , 
कई सालों पुरानी इक ,
मैं अपनी ही क़सम का ख़ुद 
ही क़ातिल होने जाता हूँ ।।
मोहब्बत में नहीं हरगिज़ 
पड़ूँगा ख़ूब सोचा था ,
मगर अब इश्क़ में हर वक़्त 
ग़ाफ़िल होने जाता हूँ ।।
न लैला का मुझे मजनूँ , 
न बनना हीर का राँझा ;
न मस्तानी का बाजीराव , 
ना फरहाद शीरीं का ;
करूँ क्या बन रही जो 
फ़ेहरिस्त अब आशिक़ों वाली ,
मैं उसमें सबसे ऊपर हाय 
शामिल होने जाता हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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