दीर्घ मुक्तक : 935 - सूरज


जो पकड़ पाता नहीं खरगोश का बच्चा ,
अपनी इक मुट्ठी में गज-ऊरज पकड़ डाला ।।
जो न गुब्बारा फुला सकता , बजाने को ,
आज उसने हाथ में तूरज पकड़ डाला ।।
आज तो जानूँ न क्या-क्या मुझसे हो बैठा ?
पत्थरों में फूल के मैं बीज बो बैठा ।
धूप में भी जो झुलस जाता है रात उसने ,
दोपहर का स्वप्न में सूरज पकड़ डाला ।।
( गज-ऊरज = बलिष्ठ हाथी , तूरज = तुरही जिसे उच्च शक्ति से फूँककर बजाया जाता है )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

kuldeep thakur said…

जय मां हाटेशवरी.......

आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
10/11/2019 रविवार को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में. .....
सादर आमंत्रित है......

अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
http s://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद
धन्यवाद । कुलदीप ठाकुर जी ।
Rohitas ghorela said…
बहुत खूब।
जुगत लगाएं तो क्या नहीं होता।
मेरी नई पोस्ट पर स्वागत है👉👉 जागृत आँख 
धन्यवाद । रोहितास जी ।
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10 -11-2019) को "आज रामजी लौटे हैं घर" (चर्चा अंक- 3515) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं….
**********************
रवीन्द्र सिंह यादव
धन्यवाद । यादव जी ।
Onkar said…
बहुत सुन्दर
धन्यवाद । ओंकार जी ।
बहुत खूब उम्दा भाव।
धन्यवाद । मन की वीणा जी ।

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे