दीर्घ मुक्तक : 933 - दुनिया


माँगा था मैंने उनसे जो चाह कर भी अब वे ,
मालूम है न हरगिज़ ला पाएँगे कभी रे ।।
रहता है फिर भी उनका ही इंतिज़ार भरसक ,
है जब पता न वे अब आ पाएँँगे कभी रे ।।
बनकर हमारी दुनिया ; दुनिया से जाने वाले ।
होकर हमारे हमको ,अपना बनाने वाले ।
करते न प्यार इतना गर जानते कि दिल से ,
शायद न जीते जी वे जा पाएँगे कभी रे।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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