ग़ज़ल : 282 - शंघाई


हूँ बहुत बदशक्ल कुछ रानाई लाकर दे ।।
देख सब मुँह फेरें इक शैदाई लाकर दे ।।
हर तरफ़ से बस नुकीला खुरदुरा ही हूँ ,
आह कुछ गोलाई , कुछ चिकनाई लाकर दे ।।
बख़्श मत ऊँचाई बेशक़ बित्ते भर क़द को ,
आदमी जैसी मगर लंबाई लाकर दे ।।
मुझ में खोकर , मुझसे ! खुद को ; ज्यों का त्यों वापस ,
वो न थी जिसकी ज़ुबाँ चिल्लाई लाकर दे ।।
मह्फ़िलो मज्मा मुझे बेचैन करते हैं ,
जो सुकूँ दे , मुझको वो तनहाई लाकर दे ।।
ख़्वाब में तोहफ़े में उसने मुझको दी दिल्ली ,
मैंने नींदों में कहा शंघाई लाकर दे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Rohitas ghorela said…
चाहतों की दुनियां में देखो क्या क्या होता है।
शानदार रचना।

मेरी कुछ पंक्तियां आपकी नज़र 👉👉 ख़ाका 
धन्यवाद । रोहितास जी ।
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-11-2019) को     "हिस्सा हिन्दुस्तान का, सिंध और पंजाब"     (चर्चा अंक- 3522)    पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
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डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।
Anita saini said…
बेहतरीन अभिव्यक्ति आदरणीय सृजन के माध्यम से मानवीय मूल्यों की गुहार मन द्रवित कर गयी.
सादर
धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।
वाह बहुत खूब, शानदार प्रस्तुति।
धन्यवाद । मन की वीणा ।

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