Tuesday, November 12, 2019

ग़ज़ल : 281 - दिला


अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।।
नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।।
जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे ,
वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।।
न जाने किस ग़लतफ़हमी में पड़ वो मुझसे रूठे ,
बता दें गर तो कर दूँ दूर जो शिक्वा-गिला है ।।
मैं जैसा भी हूँ अपनी वज़्ह से हूँ और ख़ुश हूँ ,
ये मेरा हाल मेरी हक़परस्ती का सिला है ।।
कोई कितना भी ताक़तवर हो लेकिन आदमी के ,
हिलाने से न इक पर्वत कभी कोई हिला है ।।
वो झूठा है जो कहता है कि उसने जो भी चाहा ,
उसे हर बार आगे-पीछे या अक्सर मिला है ।।
बना हो जो निखालिस और ख़ुशबूदार ज़र से ,
भला किसका यहाँ उसके सिवा वो दिल ; दिला है ।।
( बिला =बग़ैर , हक़परस्ती =सत्यनिष्ठा , ज़र =स्वर्ण , दिला =हे हृदय  )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (13-11-2019) को      "गठबन्धन की नाव"   (चर्चा अंक- 3518)     पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद । शास्त्री जी ।

Unknown said...

Waah

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ।

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