ग़ज़ल : 280 - लफ़ड़ा है


बेसबब मेरा नहीं दुनिया से झगड़ा है ।।
मुझको सच कहने की बीमारी ने जकड़ा है ।।
गर वो अब मुझसे लड़ा सीधा पटक दूँगा ,
देखने में वो भले ही मुझसे तगड़ा है ।।
दोनों तन्हाई में छुप-छुप मिलते , बतियाते ,
बीच में उनके यक़ीनन कुछ तो लफड़ा है ।।
मैं भी चिकना था मगर हालात ने मुझको ,
जाने किन-किन पत्थरों पर पटका-रगड़ा है ?
मर के भी मुझ में लचक उसके लिए बाक़ी ,
मेरी ख़ातिर अब भी वह मुर्दे सा अकड़ा है ।।
मुझसे बचकर भागने वाले ने जाने किस ,
रौ में बह ख़ुद आज मेरा हाथ पकड़ा है ?
और क्या सामान जीने लाज़मी मुझको ,
एक घर ,भरपेट रोटी , तन पे कपड़ा है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (07-11-2019) को      "राह बहुत विकराल"   (चर्चा अंक- 3512)    पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
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डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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