मुक्तक : 934 - अगर बख़्श दे मौत


कहा मैंने गोरे से गोरे को काला ,
सताइश मैं अब सबकी खुलकर करूँगा ।।
महासूम बनकर रहा अब क़सम से , 
फ़ैय्याज़ मैं कर्ण जैसा बनूँगा ।।
अभी तक किसी के लिए ना किया कुछ ।
हमेशा लिया ही लिया ना दिया कुछ ।
अगर बख़्श दे मौत कुछ और दिन सच 
मैं इस बार औरों की ख़ातिर जिऊंगा ।। 
( सताइश = प्रशंसा , महासूम = बहुत बड़ा कंजूस , फ़ैय्याज़ = दानी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anita saini said…
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(०४ -११ -२०१९ ) को "जिंदगी इन दिनों, जीवन के अंदर, जीवन के बाहर"(चर्चा अंक
३५०९ )
पर भी होगी
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।

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