Friday, November 15, 2019

ग़ज़ल : 282 - शंघाई


हूँ बहुत बदशक्ल कुछ रानाई लाकर दे ।।
देख सब मुँह फेरें इक शैदाई लाकर दे ।।
हर तरफ़ से बस नुकीला खुरदुरा ही हूँ ,
आह कुछ गोलाई , कुछ चिकनाई लाकर दे ।।
बख़्श मत ऊँचाई बेशक़ बित्ते भर क़द को ,
आदमी जैसी मगर लंबाई लाकर दे ।।
मुझ में खोकर , मुझसे ! खुद को ; ज्यों का त्यों वापस ,
वो न थी जिसकी ज़ुबाँ चिल्लाई लाकर दे ।।
मह्फ़िलो मज्मा मुझे बेचैन करते हैं ,
जो सुकूँ दे , मुझको वो तनहाई लाकर दे ।।
ख़्वाब में तोहफ़े में उसने मुझको दी दिल्ली ,
मैंने नींदों में कहा शंघाई लाकर दे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 937 - ख़ूबसूरत



  ( चित्र Google Search से अवतरित )
एक से बढ़कर हैं इक बुत , तुझसी मूरत कौन है ?
हुस्न की दुनिया में तुझसा ख़ूबसूरत कौन है ?
तू सभी का ख़्वाब , तू हर नौजवाँ की आर्ज़ू ,
ऐ परी ! लेकिन बता तेरी ज़रुरत कौन है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, November 12, 2019

ग़ज़ल : 281 - दिला


अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।।
नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।।
जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे ,
वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।।
न जाने किस ग़लतफ़हमी में पड़ वो मुझसे रूठे ,
बता दें गर तो कर दूँ दूर जो शिक्वा-गिला है ।।
मैं जैसा भी हूँ अपनी वज़्ह से हूँ और ख़ुश हूँ ,
ये मेरा हाल मेरी हक़परस्ती का सिला है ।।
कोई कितना भी ताक़तवर हो लेकिन आदमी के ,
हिलाने से न इक पर्वत कभी कोई हिला है ।।
वो झूठा है जो कहता है कि उसने जो भी चाहा ,
उसे हर बार आगे-पीछे या अक्सर मिला है ।।
बना हो जो निखालिस और ख़ुशबूदार ज़र से ,
भला किसका यहाँ उसके सिवा वो दिल ; दिला है ।।
( बिला =बग़ैर , हक़परस्ती =सत्यनिष्ठा , ज़र =स्वर्ण , दिला =हे हृदय  )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, November 10, 2019

दीर्घ मुक्तक : 936 - हाय


बस उसको देखते ही सच , 
कई सालों पुरानी इक ,
मैं अपनी ही क़सम का ख़ुद 
ही क़ातिल होने जाता हूँ ।।
मोहब्बत में नहीं हरगिज़ 
पड़ूँगा ख़ूब सोचा था ,
मगर अब इश्क़ में हर वक़्त 
ग़ाफ़िल होने जाता हूँ ।।
न लैला का मुझे मजनूँ , 
न बनना हीर का राँझा ;
न मस्तानी का बाजीराव , 
ना फरहाद शीरीं का ;
करूँ क्या बन रही जो 
फ़ेहरिस्त अब आशिक़ों वाली ,
मैं उसमें सबसे ऊपर हाय 
शामिल होने जाता हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, November 9, 2019

दीर्घ मुक्तक : 935 - सूरज


जो पकड़ पाता नहीं खरगोश का बच्चा ,
अपनी इक मुट्ठी में गज-ऊरज पकड़ डाला ।।
जो न गुब्बारा फुला सकता , बजाने को ,
आज उसने हाथ में तूरज पकड़ डाला ।।
आज तो जानूँ न क्या-क्या मुझसे हो बैठा ?
पत्थरों में फूल के मैं बीज बो बैठा ।
धूप में भी जो झुलस जाता है रात उसने ,
दोपहर का स्वप्न में सूरज पकड़ डाला ।।
( गज-ऊरज = बलिष्ठ हाथी , तूरज = तुरही जिसे उच्च शक्ति से फूँककर बजाया जाता है )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, November 5, 2019

ग़ज़ल : 280 - लफ़ड़ा है


बेसबब मेरा नहीं दुनिया से झगड़ा है ।।
मुझको सच कहने की बीमारी ने जकड़ा है ।।
गर वो अब मुझसे लड़ा सीधा पटक दूँगा ,
देखने में वो भले ही मुझसे तगड़ा है ।।
दोनों तन्हाई में छुप-छुप मिलते , बतियाते ,
बीच में उनके यक़ीनन कुछ तो लफड़ा है ।।
मैं भी चिकना था मगर हालात ने मुझको ,
जाने किन-किन पत्थरों पर पटका-रगड़ा है ?
मर के भी मुझ में लचक उसके लिए बाक़ी ,
मेरी ख़ातिर अब भी वह मुर्दे सा अकड़ा है ।।
मुझसे बचकर भागने वाले ने जाने किस ,
रौ में बह ख़ुद आज मेरा हाथ पकड़ा है ?
और क्या सामान जीने लाज़मी मुझको ,
एक घर ,भरपेट रोटी , तन पे कपड़ा है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, November 3, 2019

मुक्तक : 934 - अगर बख़्श दे मौत


कहा मैंने गोरे से गोरे को काला ,
सताइश मैं अब सबकी खुलकर करूँगा ।।
महासूम बनकर रहा अब क़सम से , 
मैं फ़ैय्याज़ बस कर्ण जैसा बनूँगा ।।
अभी तक किसी के लिए ना किया कुछ ।
हमेशा लिया ही लिया ना दिया कुछ ।
अगर बख़्श दे मौत कुछ और दिन सच 
मैं इस बार औरों की ख़ातिर जिऊंगा ।। 
( सताइश = प्रशंसा , महासूम = बहुत बड़ा कंजूस , फ़ैय्याज़ = दानी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, November 2, 2019

दीर्घ मुक्तक : 933 - दुनिया


माँगा था मैंने उनसे जो चाह कर भी अब वे ,
मालूम है न हरगिज़ ला पाएँगे कभी रे ।।
रहता है फिर भी उनका ही इंतिज़ार भरसक ,
है जब पता न वे अब आ पाएँँगे कभी रे ।।
बनकर हमारी दुनिया ; दुनिया से जाने वाले ।
होकर हमारे हमको ,अपना बनाने वाले ।
करते न प्यार इतना गर जानते कि दिल से ,
शायद न जीते जी वे जा पाएँगे कभी रे।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...