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Showing posts from November, 2019

ग़ज़ल : 282 - शंघाई

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हूँ बहुत बदशक्ल कुछ रानाई लाकर दे ।। देख सब मुँह फेरें इक शैदाई लाकर दे ।। हर तरफ़ से बस नुकीला खुरदुरा ही हूँ , आह कुछ गोलाई , कुछ चिकनाई लाकर दे ।। बख़्श मत ऊँचाई बेशक़ बित्ते भर क़द को , आदमी जैसी मगर लंबाई लाकर दे ।। मुझ में खोकर , मुझसे ! खुद को ; ज्यों का त्यों वापस , वो न थी जिसकी ज़ुबाँ चिल्लाई लाकर दे ।। मह्फ़िलो मज्मा मुझे बेचैन करते हैं , जो सुकूँ दे , मुझको वो तनहाई लाकर दे ।। ख़्वाब में तोहफ़े में उसने मुझको दी दिल्ली , मैंने नींदों में कहा शंघाई लाकर दे ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 937 - ख़ूबसूरत

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  ( चित्र Google Search से अवतरित )

एक से बढ़कर हैं इक बुत , तुझसी मूरत कौन है ? हुस्न की दुनिया में तुझसा ख़ूबसूरत कौन है ? तू सभी का ख़्वाब , तू हर नौजवाँ की आर्ज़ू , ऐ परी ! लेकिन बता तेरी ज़रुरत कौन है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 281 - दिला

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अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।। नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।। जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे , वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।। न जाने किस ग़लतफ़हमी में पड़ वो मुझसे रूठे , बता दें गर तो कर दूँ दूर जो शिक्वा-गिला है ।। मैं जैसा भी हूँ अपनी वज़्ह से हूँ और ख़ुश हूँ , ये मेरा हाल मेरी हक़परस्ती का सिला है ।। कोई कितना भी ताक़तवर हो लेकिन आदमी के , हिलाने से न इक पर्वत कभी कोई हिला है ।। वो झूठा है जो कहता है कि उसने जो भी चाहा , उसे हर बार आगे-पीछे या अक्सर मिला है ।। बना हो जो निखालिस और सुरभित श्वेत सोने से , भला किसका यहाँ उसके सिवा वो दिल ; दिला है ।। ( बिला = बग़ैर , हक़परस्ती = सत्यनिष्ठा , दिला = हे हृदय , हे मन ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

दीर्घ मुक्तक : 936 - हाय

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बस उसको देखते ही सच ,  कई सालों पुरानी इक , मैं अपनी ही क़सम का ख़ुद  ही क़ातिल होने जाता हूँ ।। मोहब्बत में नहीं हरगिज़  पड़ूँगा ख़ूब सोचा था , मगर अब इश्क़ में हर वक़्त  ग़ाफ़िल होने जाता हूँ ।। न लैला का मुझे मजनूँ ,  न बनना हीर का राँझा ; न मस्तानी का बाजीराव ,  ना फरहाद शीरीं का ; करूँ क्या बन रही जो  फ़ेहरिस्त अब आशिक़ों वाली , मैं उसमें सबसे ऊपर हाय  शामिल होने जाता हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

दीर्घ मुक्तक : 935 - सूरज

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जो पकड़ पाता नहीं खरगोश का बच्चा , अपनी इक मुट्ठी में गज-ऊरज पकड़ डाला ।। जो न गुब्बारा फुला सकता , बजाने को , आज उसने हाथ में तूरज पकड़ डाला ।। आज तो जानूँ न क्या-क्या मुझसे हो बैठा ? पत्थरों में फूल के मैं बीज बो बैठा । धूप में भी जो झुलस जाता है रात उसने , दोपहर का स्वप्न में सूरज पकड़ डाला ।। ( गज-ऊरज = बलिष्ठ हाथी , तूरज = तुरही जिसे उच्च शक्ति से फूँककर बजाया जाता है ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 280 - लफ़ड़ा है

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बेसबब मेरा नहीं दुनिया से झगड़ा है ।। मुझको सच कहने की बीमारी ने जकड़ा है ।। गर वो अब मुझसे लड़ा सीधा पटक दूँगा , देखने में वो भले ही मुझसे तगड़ा है ।। दोनों तन्हाई में छुप-छुप मिलते , बतियाते , बीच में उनके यक़ीनन कुछ तो लफड़ा है ।। मैं भी चिकना था मगर हालात ने मुझको , जाने किन-किन पत्थरों पर पटका-रगड़ा है ? मर के भी मुझ में लचक उसके लिए बाक़ी , मेरी ख़ातिर अब भी वह मुर्दे सा अकड़ा है ।। मुझसे बचकर भागने वाले ने जाने किस , रौ में बह ख़ुद आज मेरा हाथ पकड़ा है ? और क्या सामान जीने लाज़मी मुझको , एक घर ,भरपेट रोटी , तन पे कपड़ा है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 934 - अगर बख़्श दे मौत

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कहा मैंने गोरे से गोरे को काला ,
सताइश मैं अब सबकी खुलकर करूँगा ।।
महासूम बनकर रहा अब क़सम से , 
फ़ैय्याज़ मैं कर्ण जैसा बनूँगा ।।
अभी तक किसी के लिए ना किया कुछ ।
हमेशा लिया ही लिया ना दिया कुछ ।
अगर बख़्श दे मौत कुछ और दिन सच 
मैं इस बार औरों की ख़ातिर जिऊंगा ।। 
( सताइश = प्रशंसा , महासूम = बहुत बड़ा कंजूस , फ़ैय्याज़ = दानी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

दीर्घ मुक्तक : 933 - दुनिया

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माँगा था मैंने उनसे जो चाह कर भी अब वे , मालूम है न हरगिज़ ला पाएँगे कभी ।। रहता है फिर भी उनका ही इंतिज़ार भरसक , है जब पता न वे अब आ पाएँँगे कभी ।। बनकर हमारी दुनिया ; दुनिया से जाने वाले । होकर हमारे हमको ,अपना बनाने वाले । करते न प्यार इतना गर जानते कि दिल से , शायद न जीते जी वे जा पाएँगे कभी ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति