मादक , मसृण , मृदुल , महमहा


मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
जैसी कल थी तू आकर्षक ।
उससे और अधिक अब हर्षक ।
तू सुंदर , अप्सरा , परी तू ।
उर्वशी , रंभा से भी खरी तू ।
मैं तेरे सम्मुख सच बंदर ।
किंतु मुझे तक उछल उछलकर ,
हाय लगा मत आज कहकहा ।।
मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
मैं भी गबरू था बाँका था ,
तब तेरा मेरा टाँका था ,
रोजी-रोटी की तलाश में ,
मैं बदला जिंदा सी लाश में ,
अब तू इक राजा की रानी ,
तू मदिरा सम मैं बस पानी ,
बरसों बाद मिली है चुप कर ,
देख मुझे मत आज चहचहा ।।
मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Rohitas ghorela said…
डॉक्टर साहब आपको पहली बार पढ़ा आज।
आनन्द आ गया।
काफी दिनों बाद ब्लॉग पर कुछ अच्छा पढ़ने को मिला।
बहुत उम्दा रचना है आपकी।

हम भी थोड़ा बहुत लिख लेते हैं आप भी मेरे ब्लॉग तक आएं और आपकी आलोचनात्मक प्रतिक्रिया से रूबरू करवाएं 👉👉  लोग बोले है बुरा लगता है
Anita saini said…
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (२० -१०-२०१९ ) को " बस करो..!! "(चर्चा अंक- ३४९४) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
धन्यवाद । रोहिताश जी । अवश्य और शीघ्र ही आपके ब्लॉग पर आता हूँ ।
धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।
धन्यवाद । सुशील कुमार जोशी जी ।

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