दीर्घ मुक्तक : 931 - शिकंजा


उस जिस्म में बला की ख़ूबसूरती थी जो ,
सच इस क़दर किसी में ना दिखी भरी कभी ।।
मलिका-ए-हुस्न थीं तमाम इस जहान में ,
देखी नहीं थी उस सी दूसरी परी कभी ।।
उतरे थे इश्क़ में हम एक रज़्म की तरह ।
मज़बूत था शिकंजा जिसका अज़्म की तरह ।
चाहा तो ख़ूब कोशिशें भी कीं बहुत मगर ,
उसकी गिरफ़्त से न हो सके बरी कभी ।।
( रज़्म = युद्ध , अज़्म = संकल्प )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (30-10-2019) को     "रोज दीवाली मनाओ, तो कोई बात बने"  (चर्चा अंक- 3504)     पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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