मुक्तक : 930 - हँसी


यों तो ये सब जाने हैं हम 
कम ही हँसते हैं ;
और ये भी है पता जब 
जब भी हँसते हैं ;
ग़ालिबन फिर इस जहाँ के 
क़हक़हों पर भी ,
जो पड़े भारी ; हँसी 
कुछ ऐसी हँसते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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