मुक्तक : 928 - अंदाज़


कुछ मुफ़्लिस अंदाज़ अमीरों के रखते ।।
प्यादा होते ; ठाठ वज़ीरों के रखते ।।
ख़ुद ; ख़ुद से गुम ख़ाली-ख़ाली ग़ैरों के ,
क्यों सब मा'लूमात ज़ख़ीरों के रखते ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-10-2019) को     " सभ्यता के  प्रतीक मिट्टी के दीप"   (चर्चा अंक- 3496)   पर भी होगी। 
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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