मुक्तक : 927 - डोली


माथे बीच लगी कालिख ,
छूने भर से अंधा बोले ,
मुझको तो यह हल्दी औ' 
चंदन की रोली लगती है ।।
चपटी से भी चपटी कोई 
ईंट बहुत ही दूरी से ,
तेज़ नज़र को भी शायद 
पूछो तो गोली लगती है ।।
अक़्ल ज़रा सी जिनको ऊपर 
वाले ने कुछ कम बख़्शी ;
आँखें दीं लेकिन उनमें ना 
देखने की कुछ दम बख़्शी ;
ऐसों को हैरत क्या कंधों 
पर चलने वाली अर्थी ,
यदि ख़ामोशी से बढ़ती 
दुल्हन की डोली लगती है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anita saini said…
जी नमस्ते,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१८-१०-२०१९ ) को " व्याकुल पथिक की आत्मकथा " (चर्चा अंक- ३४९३ ) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
धन्यवाद । अनीता सैनी जी ।
Rohitas ghorela said…
रीति रिवाज वाली आंखे बंद रहती है
और लोग उसी लीक को सदियों से पीटते आ रहे हूं बिना कुछ सवाल उठाए।
बहुत खूबसूरत रचना। लाजवाब वाली।
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है 👉👉  लोग बोले है बुरा लगता है
धन्यवाद । रोहितास जी ।

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