मुक्तक : 924 - इक रब मानते हैं


मत हो हैराँ जान कर बेदिल ये सच है ,
एक बस हम ही नहीं सब मानते हैं ।।
जो भी सच्चा प्यार करते हैं जहाँ में ,
इश्क़ को ही ज़ात-ओ-मज़हब मानते हैं ।।
और तो और इश्क़ जब हद पार कर ले ,
माने आशिक़ को ख़ुदा महबूबा उसकी ;
और आशिक़ लोग महबूबा को अपनी ,
तह-ए-दिल से अपना इक रब मानते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Amar Adwiteey said…
बहुत सुंदर!
Amar Adwiteey said…
बहुत सुंदर!
धन्यवाद । अमर अद्वितीय जी ।

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