ग़ज़ल : 277 - रो रहे हैं


आजकल हालात ऐसे हो रहे हैं ,
मस्ख़रे भी खूँ के आँसू रो रहे हैं ।।
जागते रहिए ये कहने वाले प्रहरी ,
कुंभकरणी नींद में सब सो रहे हैं ।।
लोग सच्चे , हाल बदतर देख सच का ,
झूठ ही बच्चों में अपने बो रहे हैं ।।
खेलने की उम्र में कितने ही बच्चे ,
सर पे गारा , ईंट , पत्थर ढो रहे हैं ।।
वो उन्हें पाने की ज़िद में अपना सब कुछ ,
धीरे-धीरे , धीरे-धीरे खो रहे हैं ।।
भागते जाए हैं वो - वो हमसे कल तक ,
हमपे सौ जाँ से फ़िदा जो-जो रहे हैं ।।
दाग़ पेशानी के झूठे-सच्चे सारे ,
जितना मुमकिन उतना रो-रो धो रहे हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (08-10-2019) को     "झूठ रहा है हार?"   (चर्चा अंक- 3482)  पर भी होगी। --
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
-- 
श्री रामनवमी और विजयादशमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।
बहुत सुंदर सृजन।
धन्यवाद । मन की वीणा ।

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