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Showing posts from October, 2019

मुक्तक : 926 - आँधी

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आज फिर याद की ऐसी आँधी चली ।। बुझ चुकी थी जो दिल में वो आतिश जली ।। मुद्दतों बाद फिर तुम जो आए नज़र , इश्क़ ने मुझ में फिर दी मचा खलबली ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 277 - औघड़दानी

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चलता है सैलाब लिए मौजों की रवानी माँगे है ।।
इक ऐसा दरिया है जो ख़ैरात में पानी माँगे है ।।
जंगल पर जंगल कटवाने-काटने वाला हैराँ हूँ ,
हाथ पसारे आज ख़ुदा से रुत मस्तानी माँगे है ।।
इश्क़-मोहब्बत से नफ़रत का रिश्ता रखने वाला क्यों ,
आज अकेले में रो-रो इक दिलबरजानी माँगे है ?
उसकी कोई बात सुनी ना जिसने सारी उम्र मगर ,
आज उसी से शख़्स वही उसकी ही कहानी माँगे है ।।
रोजी-रोटी के लाले जिसको वो कब सोना-चाँदी ,
वह ख़्वाबों में भी रब से बस दाना-पानी माँगे है ।।
हाय नज़र जिस ओर पड़े उस जानिब ज़ह्र दिखाई दे ,
बेशक़ अब दुनिया की फ़ज़ा बस औघड़दानी माँगे है।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 925 - क्यों ?

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इश्क़-मोहब्बत की बातें करने से वह क्यों बचता है ?
क्या अब तक नाबालिग़ है वह या फिर कोई बच्चा है ? 
नौजवान क्या बच्चे भी जिस दौर में इश्क़ हैं फ़रमाते ,
वह पट्ठा क्यों सिर्फ़ ज़ुह्द की भारी बातें करता है ?
( नाबालिग़ = अवयस्क , पट्ठा = जवान , ज़ुह्द = विरक्ति , इंद्रिय निग्रह )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 277 - रो रहे हैं

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आजकल हालात ऐसे हो रहे हैं , मस्ख़रे भी खूँ के आँसू रो रहे हैं ।। जागते रहिए ये कहने वाले प्रहरी , कुंभकरणी नींद में सब सो रहे हैं ।। लोग सच्चे , हाल बदतर देख सच का , झूठ ही बच्चों में अपने बो रहे हैं ।। खेलने की उम्र में कितने ही बच्चे , सर पे गारा , ईंट , पत्थर ढो रहे हैं ।। वो उन्हें पाने की ज़िद में अपना सब कुछ , धीरे-धीरे , धीरे-धीरे खो रहे हैं ।। भागते जाए हैं वो - वो हमसे कल तक , हमपे सौ जाँ से फ़िदा जो-जो रहे हैं ।। दाग़ पेशानी के झूठे-सच्चे सारे , जितना मुमकिन उतना रो-रो धो रहे हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 924 - इक रब मानते हैं

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मत हो हैराँ जान कर बेदिल ये सच है ,
एक बस हम ही नहीं सब मानते हैं ।।
जो भी सच्चा प्यार करते हैं जहाँ में ,
इश्क़ को ही ज़ात-ओ-मज़हब मानते हैं ।।
और तो और इश्क़ जब हद पार कर ले ,
माने आशिक़ को ख़ुदा महबूबा उसकी ;
और आशिक़ लोग महबूबा को अपनी ,
तह-ए-दिल से अपना इक रब मानते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति