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Showing posts from October, 2019

मुक्तक : 932 - अनगढ़

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उतरता रहा हूँ  कि चढ़ता रहा मैं ?
मगर इतना तय है कि बढ़ता रहा मैं ।।
कभी भी किसी बुत को तोड़ा न मैंने ,
हमेशा ही अनगढ़ को गढ़ता रहा मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 279 - दुश्मन

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कँवल जैसा खिला चेहरा वो कब दहशतज़दा होगा ? कब उस दुश्मन के पीछे एक पड़ा वहशी ददा होगा ? हमेशा मुस्कुराता है , सदा हँसता ही रहता है , वो दिन कब आएगा मेरा अदू जब ग़मज़दा होगा ? कोई कब तक बचा रक्खेगा ख़ुद को हाय ! पीने से , किसी के घर के आगे ही खुला जब मैक़दा होगा ? लतीफ़ों पर भी वह कैसे हँसेगा जिसकी क़िस्मत में , शुरू से लेके आख़िर तक अगर रोना बदा होगा ? बचा कुछ भी न अब जब पास मेरे लुट गया सब कुछ , लिया मैंने जो उससे है वो फिर कैसे अदा होगा ? ज़ुबाँ सचमुच कटालूँ गर ज़ुबाँ दे तू मुझे ; कल से , मेरी ख़ामोशियों की उम्र भर तू ही सदा होगा ।। ज़मानत क्या कि मैं सब मार दूँ दुनिया के भिखमंगे , ज़माने में न फिर कोई नया पैदा गदा होगा ? ( दहशतज़दा = आतंकित , ददा = हिंसक दरिंदा , मैक़दा = शराबख़ाना , सदा = पुकार , आवाज़ , गदा = भिखारी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 278 - हल

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जकड़ कर वो मुझसे उछल कह रहे हैं ।।
मेरे काटकर पैर चल कह रहे हैं ।।
क़लम क्या ज़रा सी लगे थामने बस ,
नहीं कुछ ग़ज़ल पर ग़ज़ल कह रहे हैं ।।
न जाने है क्या उसमें उसको जहाँ में ,
सिवा मेरे सब ही कँवल कह रहे हैं ?
मैं जैसा हूँ अच्छा हूँ लेकिन मुझे सब ,
जहाँ के मुताबिक़ बदल कह रहे हैं ।।
ज़रा भी न अब लड़खड़ाऊँ मैं फिर क्यों ,
अभी भी मुझे सब सँभल कह रहे हैं ?
अमीर अपने घर में ग़रीबी को घर से ,
बड़े ज़ोर चिल्ला निकल कह रहे हैं ।।
मेरी ; मेरे ; मेरे ही मुँह पर ग़ज़ब है ,
वफ़ादारियों को दग़ल कह रहे हैं !!
हुआ ख़ैरमक़्दम यूँ उनका मेरे घर ,
मेरी झोपड़ी वो महल कह रहे हैं ।।
ज़रा सा मैं उठने को क्या गिर गया हूँ ,
मरा वो मुझे आजकल कह रहे हैं ।।
सवालों पे मेरे , सवालों को अपने ,
वो मेरे सवालों का हल कह रहे हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

दीर्घ मुक्तक : 931 - शिकंजा

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उस जिस्म में बला की ख़ूबसूरती थी जो ,
सच इस क़दर किसी में ना दिखी भरी कभी ।।
मलिका-ए-हुस्न थीं तमाम इस जहान में ,
देखी नहीं थी उस सी दूसरी परी कभी ।।
उतरे थे इश्क़ में हम एक रज़्म की तरह ।
मज़बूत था शिकंजा जिसका अज़्म की तरह ।
चाहा तो ख़ूब कोशिशें भी कीं बहुत मगर ,
उसकी गिरफ़्त से न हो सके बरी कभी ।।
( रज़्म = युद्ध , अज़्म = संकल्प )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 930 - हँसी

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यों तो ये सब जाने हैं हम 
कम ही हँसते हैं ;
और ये भी है पता जब 
जब भी हँसते हैं ;
ग़ालिबन फिर इस जहाँ के 
क़हक़हों पर भी ,
जो पड़े भारी ; हँसी 
कुछ ऐसी हँसते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 929 - चुस्कियाँ

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याद में ; यार की ; हिचकियाँ ली गयीं ।। गीत गाते कई मुरकियाँ ली गयीं ।। दिल हुआ गर नशे का तो दारू नहीं , प्याली में चाय की चुस्कियाँ ली गयीं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 928 - अंदाज़

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कुछ मुफ़्लिस अंदाज़ अमीरों के रखते ।। प्यादा होते ; ठाठ वज़ीरों के रखते ।। ख़ुद ; ख़ुद से गुम ख़ाली-ख़ाली ग़ैरों के , क्यों सब मा'लूमात ज़ख़ीरों के रखते ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मादक , मसृण , मृदुल , महमहा

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मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
जैसी कल थी तू आकर्षक ।
उससे और अधिक अब हर्षक ।
तू सुंदर , अप्सरा , परी तू ।
उर्वशी , रंभा से भी खरी तू ।
मैं तेरे सम्मुख सच बंदर ।
किंतु मुझे तक उछल उछलकर ,
हाय लगा मत आज कहकहा ।।
मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
मैं भी गबरू था बाँका था ,
तब तेरा मेरा टाँका था ,
रोजी-रोटी की तलाश में ,
मैं बदला जिंदा सी लाश में ,
अब तू इक राजा की रानी ,
तू मदिरा सम मैं बस पानी ,
बरसों बाद मिली है चुप कर ,
देख मुझे मत आज चहचहा ।।
मादक , मसृण , मृदुल , महमहा ।।
तव यौवन झूमें है लहलहा ।। 
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 927 - डोली

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माथे बीच लगी कालिख ,
छूने भर से अंधा बोले ,
मुझको तो यह हल्दी औ' 
चंदन की रोली लगती है ।।
चपटी से भी चपटी कोई 
ईंट बहुत ही दूरी से ,
तेज़ नज़र को भी शायद 
पूछो तो गोली लगती है ।।
अक़्ल ज़रा सी जिनको ऊपर 
वाले ने कुछ कम बख़्शी ;
आँखें दीं लेकिन उनमें ना 
देखने की कुछ दम बख़्शी ;
ऐसों को हैरत क्या कंधों 
पर चलने वाली अर्थी ,
यदि ख़ामोशी से बढ़ती 
दुल्हन की डोली लगती है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 926 - आँधी

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आज फिर याद की ऐसी आँधी चली ।। बुझ चुकी थी जो दिल में वो आतिश जली ।। मुद्दतों बाद फिर तुम जो आए नज़र , इश्क़ ने मुझ में फिर दी मचा खलबली ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 277 - औघड़दानी

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चलता है सैलाब लिए मौजों की रवानी माँगे है ।।
इक ऐसा दरिया है जो ख़ैरात में पानी माँगे है ।।
जंगल पर जंगल कटवाने-काटने वाला हैराँ हूँ ,
हाथ पसारे आज ख़ुदा से रुत मस्तानी माँगे है ।।
इश्क़-मोहब्बत से नफ़रत का रिश्ता रखने वाला क्यों ,
आज अकेले में रो-रो इक दिलबरजानी माँगे है ?
उसकी कोई बात सुनी ना जिसने सारी उम्र मगर ,
आज उसी से शख़्स वही उसकी ही कहानी माँगे है ।।
रोजी-रोटी के लाले जिसको वो कब सोना-चाँदी ,
वह ख़्वाबों में भी रब से बस दाना-पानी माँगे है ।।
हाय नज़र जिस ओर पड़े उस जानिब ज़ह्र दिखाई दे ,
बेशक़ अब दुनिया की फ़ज़ा बस औघड़दानी माँगे है।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 925 - क्यों ?

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इश्क़-मोहब्बत की बातें करने से वह क्यों बचता है ?
क्या अब तक नाबालिग़ है वह या फिर कोई बच्चा है ? 
नौजवान क्या बच्चे भी जिस दौर में इश्क़ हैं फ़रमाते ,
वह पट्ठा क्यों सिर्फ़ ज़ुह्द की भारी बातें करता है ?
( नाबालिग़ = अवयस्क , पट्ठा = जवान , ज़ुह्द = विरक्ति , इंद्रिय निग्रह )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 277 - रो रहे हैं

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आजकल हालात ऐसे हो रहे हैं , मस्ख़रे भी खूँ के आँसू रो रहे हैं ।। जागते रहिए ये कहने वाले प्रहरी , कुंभकरणी नींद में सब सो रहे हैं ।। लोग सच्चे , हाल बदतर देख सच का , झूठ ही बच्चों में अपने बो रहे हैं ।। खेलने की उम्र में कितने ही बच्चे , सर पे गारा , ईंट , पत्थर ढो रहे हैं ।। वो उन्हें पाने की ज़िद में अपना सब कुछ , धीरे-धीरे , धीरे-धीरे खो रहे हैं ।। भागते जाए हैं वो - वो हमसे कल तक , हमपे सौ जाँ से फ़िदा जो-जो रहे हैं ।। दाग़ पेशानी के झूठे-सच्चे सारे , जितना मुमकिन उतना रो-रो धो रहे हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 924 - इक रब मानते हैं

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मत हो हैराँ जान कर बेदिल ये सच है ,
एक बस हम ही नहीं सब मानते हैं ।।
जो भी सच्चा प्यार करते हैं जहाँ में ,
इश्क़ को ही ज़ात-ओ-मज़हब मानते हैं ।।
और तो और इश्क़ जब हद पार कर ले ,
माने आशिक़ को ख़ुदा महबूबा उसकी ;
और आशिक़ लोग महबूबा को अपनी ,
तह-ए-दिल से अपना इक रब मानते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति