मुक्तक : 923 - मश्वरा


लेकर मशाल रौशन करने न चल पड़ो तुम 
उसको जो कोयले की इक खान है ; सँभलना ।।
आँखों में नींद भर उस पर चल दिए हो सोने ,
बिस्तर सा वो नुकीली चट्टान है ; सँभलना ।।
अंदर है उसमें ज़िंदा ज्वालामुखी धधकता ,
लेकिन ज़ुबाँ से उसके ठंडा शहद टपकता ,
इक मश्वरा है उससे मत दोस्ती रखो सच ,
तुम झोंपड़ी हो वो इक तूफ़ान है ; सँभलना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (02-10-2019) को    "बापू जी का जन्मदिन"    (चर्चा अंक- 3476)     पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
धन्यवाद । शास्त्री जी ।
बहुत बहुत सुंदर सृजन।
Anita saini said…
बहुत ही सुन्दर सृजन आदरणीय
सादर
धन्यवाद । मन की वीणा ।
धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।

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