मुक्तक : 922 - नच रहा हूँ


तुम मानों या न मानों 
यह कह मैं सच रहा हूँ ।।
बारिश में भीगने से 
हरगिज़ न बच रहा हूँ ।।
दरअस्ल मैं किसी को 
नीचे दरख़्त के रुक ,
चोरी से नचते तक दिल 
ही दिल में नच रहा हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Anita saini said…
जी नमस्ते,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (29-09-2019) को "नाज़ुक कलाई मोड़ ना" (चर्चा अंक- 3473) पर भी चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

आप भी सादर आमंत्रित है
.--
अनीता सैनी
धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।

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