मुक्तक : 918 - गुलगुला


तीखा मौसम मालपुआ , गुलगुला हुआ है ।।
धरती गीली श्याम गगन अब धुला हुआ है ।।
हम इसके आनन्द में रम ये भूल गये कब ,
बरखा बंद हुई पर छाता खुला हुआ है ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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