ग़ज़ल : 276 - जिद्दोजहद


बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , ख़ूब मेहनत से ।।
न हो हैराँ मोहब्बत की है मैंने घोर नफ़रत से ।। 1 ।।
हूंँ जो आज इस मुक़ाँ पर तो बड़ी ही मुश्क़िलों से हूँ ,
न इत्मीनान से , आराम से , ना सिर्फ़ क़िस्मत से ।। 2 ।।
यक़ीनन जंग लड़कर ही किया मैंने भी हक़ हासिल ,
मिला कब माँगने से , इल्तिजा से , सिर्फ़ चाहत से ।। 3 ।।
न जब राज़ी हुए थे वो मेरी दरख्व़ास्त सुनने को ,
मैं चढ़ बैठा था नीचे कूदने ऊँची इमारत से ।। 4 ।।
वहाँ सख्त़ी से , बेदर्दी से उसने दिल किये टुकड़े ,
यहाँ तोड़ा न मैंने पत्थरों को भी नज़ाकत से ।। 5 ।।
ज़रूरी तो नहीं सूरत अमीराना हो जिसकी वो ,
हक़ीक़त में हो दौलतमंद , ना हो तंग ग़ुर्बत से ।। 6 ।।
( जिद्दोजहद = पराक्रम , कशमकश = असमंजस , इल्तिजा = निवेदन , ग़ुर्बत = कंगाली )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (16-09-2019) को    "हिन्दी को वनवास"    (चर्चा अंक- 3460)   पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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