मुक्तक : 914 - मरीज़-ए-इश्क़


मैंने माना मैं मरीज़-ए-इश्क़ तेरा , 
और तू मेरे लिए बीमार है , हाँ ।।
दरमियाँ अपने मगर सदियों पुरानी ; 
एक पक्की चीन की दीवार है , हाँ ।।
इक बड़ा सा फ़र्क़ तेरी मेरी हस्ती ; 
ज़ात , मज़हब , शख्स़ियत , औक़ात में है ,
यूँ समझ ले मैं हूँ इक अद्ना सी मंज़िल ; 
तू फ़लकबोस इक कुतुबमीनार है , हाँ ।।
( दरमियाँ = मध्य , फ़लकबोस = गगनचुंबी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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