मुक्तक : 913 - स्वप्न


दादुर उछल शिखी को नचना सिखा रहा है ।।
ज्ञानी को अज्ञ अपनी कविता लिखा रहा है ।।
उठ बैठा चौंककर मैं जब स्वप्न में ये देखा ,
इक नेत्रहीन सुनयन को अँख दिखा रहा है ।।
( दादुर = मेंढक , शिखी = मोर , अज्ञ = मूर्ख )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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