मुक्तक : 911 - हुजूर


सोचा नहीं था मुझसे मेरा हुजूर होगा ।।
जितना क़रीब था वो उतना ही दूर होगा ।।
मैं मानता कहाँ हूँ दस्तूर इस जहाँ का  ,
आया है जो भी उसको जाना ज़रूर होगा ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

dilbag virk said…
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8.8.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3421 में दिया जाएगा

धन्यवाद

दिलबागसिंह विर्क
धन्यवाद । दिलबाग सिंह विर्क जी ।

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे