Wednesday, July 31, 2019

मुक्तक : 908 - गर्मी की दोपहर


लाकर कहीं से उनपे बादलों को छाऊँ मैं ।। 
भरभर हिमालयों से बर्फ जल चढ़ाऊँ मैं ।।
गर्मी की दोपहर के सूर्य से वो जल रहे ,
सोचूँ किसी भी तरह से उन्हें बुझाऊँ मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (02-08-2019) को "लेखक धनपत राय" (चर्चा अंक- 3415) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद । शास्त्री जी ।

Onkar said...

सुन्दर रचना

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद । ओंकार जी ।

मुक्तक : 583 - हे शिव जो जग में है

हे शिव जो जग में है अशिव तुरत निवार दो ।। परिव्याप्त मलिन तत्व गंग से निखार दो ।। स्वर्गिक बना दो पूर्वकाल सी धरा पुनः , या खो...