मुक्तक : 907 - छाता


आता हुआ मैं या फिर जाता ख़रीद लूँ ।।
मन को हो नापसंद या भाता ख़रीद लूँ ।।
लेकिन ये लाज़िमी है बाज़ार से कोई ,
बरसात आ रही इक छाता ख़रीद लूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (31-07-2019) को "राह में चलते-चलते"
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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