Sunday, July 28, 2019

मुक्तक : 906 - पत्तल


किस पाप की सख़्त सज़ा चुप ऐसे काट रहा है ?
इतना भी है क्यों बेकस वो कभी जो लाट रहा है ?
हैराँ हूँ कई पेटों का वो पालनहार ही आख़िर -
क्यों ख़ुद भूख में जूठी पत्तल चाट रहा है ?
( बेकस = असहाय , लाट = लार्ड शब्द का अपभ्रंश )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-07-2019) को "गर्म चाय का प्याला आया" (चर्चा अंक- 3412) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद । शास्त्री जी ।

मन की वीणा said...

सार्थक सृजन।

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ।

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...