मुक्तक : 905 - तिरकिट


तिरकिट-धा-धिन-तिनक-धिन
तबला बजा बजाकर ।।
अख़बारी सुर्ख़ियों को 
पढ़-पढ़ सुना-सुनाकर ।।
लेकिन वो अपने दर्दो- 
ग़म की कहानियों को ,
बेचे कभी न हरगिज़ 
आंँसू बहा बहा कर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-07-2019) को "आशियाना चाहिए" (चर्चा अंक- 3404) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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