मुक्तक : 903 - गैया


अनुमान भी न तुम लगा सकोगे कि भैया ,
किस सोच में बैठा हूँ चराते हुए गैया ?
दिखता हूँ किनारे पे किंंतु हूँ मैं भँवर में , 
कैसे लगेगी पार मेरी कागज़ी नैया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-07-2019) को "बड़े होने का बहाना हर किसी के पास है" (चर्चा अंक- 3398) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।
धन्यवाद । अनिता जी ।

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