मुक्तक : 901- बैठ जाता हूँ


मैं उनके सामने ख़ुद को गिराकर बैठ जाता हूँ ।।
उठे सर को सलीक़े से झुकाकर बैठ जाता हूँ ।।
मुझे सर पर बिठाने वो रहें तैयार लेकिन मैं ,
हमेशा उनके क़दमों में ही जाकर बैठ जाता हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (12-07-2019) को "भँवरों को मकरन्द" (चर्चा अंक- 3394) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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