मुक्तक : 900 - ग़म का छुपाना


किसी गिर पड़े को झपट कर उठाना ।।
किसी ज़ख़्म खाए को मरहम लगाना ।।
ये आदत तुम्हारी नहीं ताज़ा-ताज़ा , 
है ये शौक तुममें निहायत पुराना ।।
हमें सब पता है कि क्या माज़रा है ,
कि क्या मग़्ज़े सर में क्या दिल में भरा है ?
तुम्हारा ये हर वक्त का मुस्कुराना ,
हमें सिर्फ़ लगता है ग़म का छुपाना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-07-2019) को "चिट्ठों की किताब" (चर्चा अंक- 3390) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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