मुक्त ग़ज़ल : 275 - गुलबदन


काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।।
पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।।
महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज ,
जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।।
चंद हादसों ने सच में क्या से क्या बना दिया ,
जैसे हैं आज वैसे तो न थे अपन कभी ।।
मिट्टी के ढेले बन के रह गए हैं आजकल ,
आता नहीं यक़ीं कि सच थे हम रतन कभी ।।
बारिश के रूठने से बन के नाली रह गए ,
हम भी थे दसियों साल पहले तक जमन कभी ।।
पीरी में सारी शोख़ियों ने अलविदा कहा ,
जोबन में हम में भी ग़ज़ब था बाँकपन कभी ।।
( यक़्कोतन्हा = नितांत अकेला , जमन = यमुना नदी  , पीरी = वृद्धावस्था )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (09-07-2019) को "जुमले और जमात" (चर्चा अंक- 3391) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद । शास्त्री जी ।

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