Wednesday, July 31, 2019

मुक्तक : 908 - गर्मी की दोपहर


लाकर कहीं से उनपे बादलों को छाऊँ मैं ।। 
भरभर हिमालयों से बर्फ जल चढ़ाऊँ मैं ।।
गर्मी की दोपहर के सूर्य से वो जल रहे ,
सोचूँ किसी भी तरह से उन्हें बुझाऊँ मैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, July 29, 2019

मुक्तक : 907 - छाता


आता हुआ मैं या फिर जाता ख़रीद लूँ ।।
मन को हो नापसंद या भाता ख़रीद लूँ ।।
लेकिन ये लाज़िमी है बाज़ार से कोई ,
बरसात आ रही इक छाता ख़रीद लूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 28, 2019

मुक्तक : 906 - पत्तल


किस पाप की सख़्त सज़ा चुप ऐसे काट रहा है ?
इतना भी है क्यों बेकस वो कभी जो लाट रहा है ?
हैराँ हूँ कई पेटों का वो पालनहार ही आख़िर -
क्यों ख़ुद भूख में जूठी पत्तल चाट रहा है ?
( बेकस = असहाय , लाट = लार्ड शब्द का अपभ्रंश )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 25, 2019

सेल्फ़ी


सब वफ़ादारी मेरी फिर आपकी , 
सिर्फ़ अपनापन ज़रा सा दीजिए ।।
ख़ूबसूरत मैं भी हूँ मुझ पर अगर , 
प्यार से अपनी नज़र इक कीजिए ।।
कुछ नहीं सचमुच नहीं कुछ आज बस , 
चाहता हूँ आप अपने हाथ से ,
सेल्फ़ी तो ख़ूब खींचीं आपने , 
इक मेरी तस्वीर भी ले लीजिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 21, 2019

मुक्तक : 906 - बोलो न अहमक़


जो बेमौत मारे गए या मरे ख़ुद , 
उन्हें तुम किसी हक़ से बोलो न अहमक़ !!
गर इतना जो हो जाता दुनिया में शायद , 
ज़मीं ही फिर हो जाती जन्नत बिलाशक़ !!
नदी-कूप पर होता प्यासों का क़ब्ज़ा , 
ग़रीबों , फ़क़ीरों का दौलत पे कुछ हक़ ,
जो होता ज़रूरी वो पास होता सबके ,
तो फिर ख़ुदकुशीे क्यों कोई करता नाहक़ ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, July 20, 2019

मुक्तक : 905 - तिरकिट


तिरकिट-धा-धिन-तिनक-धिन
तबला बजा बजाकर ।।
अख़बारी सुर्ख़ियों को 
पढ़-पढ़ सुना-सुनाकर ।।
लेकिन वो अपने दर्दो- 
ग़म की कहानियों को ,
बेचे कभी न हरगिज़ 
आंँसू बहा बहा कर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, July 19, 2019

मुक्तक : 904 - फाड़कर


पथरीली सरज़मीं पर 
कर करके गहरे गड्ढे ,
फिर से न आएँ बाहर 
ऐसे मैं गाड़कर रे।।
हरगिज़ न कोई दर्जी 
फिर से जो सिल सके ,
कुछ इस तरह के टुकड़े 
टुकड़ों में फाड़कर रे ।।
कुछ आपके वहाँ का , 
कुछ मेरे भी यहाँ का ,
जानूँ न कैसा-कैसा ,
जाने कहाँ-कहाँ का ?
आँखों से अपनी चुन-चुन 
देखो मैं बेच घोड़े ,
सपनों का सारा कचरा 
सोता हूँ झाड़ कर रे।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 14, 2019

मुक्तक : 903 - गैया



अनुमान भी तुम ना लगा सकोगे कि भैया ,
किस धुन में चराते हुए मैं बैठा हूँ गैया ?
दिखता हूँ किनारे पे किंंतु हूँ मैं भँवर में , 
क्या पार लगेगी रे मेरी कागज़ी नैया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, July 12, 2019

मुक्तक : 902 - चकोरा


कब मेरी जानिब वो शर्माकर बढ़ेंगे यार ?
जो मैं सुनना चाहूँ वो कब तक कहेंगे यार ?
ज्यों चकोरा चाँद को देखे है सारी रात ,
इक नज़र भर भी मुझे वो कब तकेंगे यार ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 11, 2019

मुक्तक : 901- बैठ जाता हूँ


मैं उनके सामने ख़ुद को गिराकर बैठ जाता हूँ ।।
उठे सर को सलीक़े से झुकाकर बैठ जाता हूँ ।।
मुझे सर पर बिठाने वो रहें तैयार लेकिन मैं ,
हमेशा उनके क़दमों में ही जाकर बैठ जाता हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 7, 2019

ग़ज़ल : 275 - गुलबदन


काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।।
पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।।
महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज ,
जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।।
चंद हादसों ने सच में क्या से क्या बना दिया ,
जैसे हैं आज वैसे तो न थे अपन कभी ।।
मिट्टी के ढेले बन के रह गए हैं आजकल ,
आता नहीं यक़ीं कि सच थे हम रतन कभी ।।
बारिश के रूठने से बन के नाली रह गए ,
हम भी थे दसियों साल पहले तक जमन कभी ।।
पीरी में सारी शोख़ियों ने अलविदा कहा ,
जोबन में हम में भी ग़ज़ब था बाँकपन कभी ।।
( यक़्कोतन्हा = नितांत अकेला , जमन = यमुना नदी  , पीरी = वृद्धावस्था )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, July 6, 2019

मुक्तक : 900 - ग़म का छुपाना


किसी गिर पड़े को झपट कर उठाना ।।
किसी ज़ख़्म खाए को मरहम लगाना ।।
ये आदत तुम्हारी नहीं ताज़ा-ताज़ा , 
है ये शौक़ तुममें निहायत पुराना ।।
हमें सब पता है कि क्या माज़रा है ,
कि क्या मग़्ज़े सर में क्या दिल में भरा है ?
तुम्हारा ये हर वक़्त का मुस्कुराना ,
हमें सिर्फ़ लगता है ग़म का छुपाना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...