Saturday, June 22, 2019

मुक्तक


सब्र से कुर्सी पे भी सच बैठते कब हैं ?
नींद भी लेते खड़े ही लेटते कब हैं ?
हर तरफ़ माहौल बेशक़ ख़ूबसूरत है ,
आँख रखकर भी मगर हम देखते कब हैं ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

4 comments:

Anita saini said...

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23 -06-2019) को "आप अच्छे हो" (चर्चा अंक- 3375) पर भी होगी।

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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
....
अनीता सैनी

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद । अनिता सैनी जी ।

मन की वीणा said...

वाह बहुत खूबसूरत।

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद । मन की वीणा जी ।

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...